अमृतसर आ गया है… (भाग-1): भीष्म साहनी की कहानी

October 10, 2022, 6:41 PM IST

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Bhishma Sahni

गाड़ी के डिब्बे में बहुत मुसाफ़िर नहीं थे. मेरे सामनेवाली सीट पर बैठे सरदार जी देर से मुझे लाम के क़िस्से सुनाते रहे थे. वह लाम के दिनों में बर्मा की लड़ाई में भाग ले चुके थे और बात-बात पर खी-खी करके हँसते और गोरे फ़ौजियों की खिल्ली उड़ाते रहे थे. डिब्बे में तीन पठान व्यापारी भी थे, उनमें से एक हरे रंग की पोशाक पहने ऊपरवाली बर्थ पर लेटा हुआ था. वह आदमी बड़ा हँसमुख था और बड़ी देर से मेरे साथवाली सीट पर बैठे एक दुबले-से बाबू के साथ उसका मज़ाक चल रहा था. वह दुबला बाबू पेशावर का रहनेवाला जान पड़ता था क्योंकि किसी-किसी वक़्त वे आपस में पश्तो में बातें करने लगते थे. मेरे सामने दाईं ओर कोने में, एक बुढ़िया मुँह-सिर ढाँपे बैठी थी और देर से माला जप रही थी. यही कुछ लोग रहे होंगे. संभव है दो-एक और मुसाफ़िर भी रहे हों, पर वे स्पष्टत: मुझे याद नहीं.

गाड़ी धीमी रफ़्तार से चली जा रही थी, और गाड़ी में बैठे मुसाफ़िर बतिया रहे थे और बाहर गेहूँ के खेतों में हल्की-हल्की लहरियाँ उठ रही थीं, और मैं मन-ही-मन बड़ा ख़ुश थाए क्योंकि मैं दिल्ली में होनेवाला स्वतंत्रता-दिवस समारोह देखने जा रहा था.

उन दिनों के बारे में सोचता हूँ, तो लगता है, हम किसी झुटपुटे में जी रहे हैं. शायद समय बीत जाने पर अतीत का सारा व्यापार ही झुटपुटे में बीता जान पड़ता है. ज्यों-ज्यों भविष्य के पट खुलते जाते हैं, यह झुटपुटा और भी गहराता चला जाता है.

उन्हीं दिनों पाकिस्तान के बनाए जाने का ऐलान किया गया था और लोग तरह-तरह के अनुमान लगाने लगे थे कि भविष्य में जीवन की रूपरेखा कैसी होगी. पर किसी की भी कल्पना बहुत दूर तक नहीं जा पाती थी. मेरे सामने बैठे सरदार जी बार-बार मुझसे पूछ रहे थे कि पाकिस्तान बन जाने पर जिन्ना साहिब बंबई में ही रहेंगे या पाकिस्तान में जा कर बस जाएँगे, और मेरा हर बार यही जवाब होता – बंबई क्यों छोड़ेंगे, पाकिस्तान में आते-जाते रहेंगे, बंबई छोड़ देने में क्या तुक है! लाहौर और गुरदासपुर के बारे में भी अनुमान लगाए जा रहे थे कि कौन-सा शहर किस ओर जाएगा. मिल बैठने के ढंग में, गप-शप में, हँसी-मज़ाक में कोई विशेष अंतर नहीं आया था. कुछ लोग अपने घर छोड़ कर जा रहे थे, जबकि अन्य लोग उनका मज़ाक उड़ा रहे थे. कोई नहीं जानता था कि कौन-सा क़दम ठीक होगा और कौन-सा ग़लत. एक ओर पाकिस्तान बन जाने का जोश था तो दूसरी ओर हिंदुस्तान के आज़ाद हो जाने का जोश. जगह-जगह दंगे भी हो रहे थे, और यौम-ए-आज़ादी की तैयारियाँ भी चल रही थीं. इस पूष्ठभूमि में लगता, देश आज़ाद हो जाने पर दंगे अपने-आप बंद हो जाएँगे. वातावरण में इस झुटपुट में आज़ादी की सुनहरी धूल-सी उड़ रही थी और साथ-ही-साथ अनिश्चय भी डोल रहा था, और इसी अनिश्चय की स्थिति में किसी-किसी वक़्त भावी रिश्तों की रूपरेखा झलक दे जाती थी.

शायद जेहलम का स्टेशन पीछे छूट चुका था जब ऊपर वाली बर्थ पर बैठे पठान ने एक पोटली खोल ली और उसमें से उबला हुआ मांस और नान-रोटी के टुकड़े निकाल-निकाल कर अपने साथियों को देने लगा. फिर वह हँसी-मज़ाक के बीच मेरी बगल में बैठे बाबू की ओर भी नान का टुकड़ा और मांस की बोटी बढ़ा कर खाने का आग्रह करने लगा था – ‘का ले, बाबू, ताक़त आएगी. अम जैसा ओ जाएगा. बीवी बी तेरे सात कुश रएगी. काले दालकोर, तू दाल काता ए, इसलिए दुबला ए…’

डिब्बे में लोग हँसने लगे थे. बाबू ने पश्तो में कुछ जवाब दिया और फिर मुस्कराता सिर हिलाता रहा.

इस पर दूसरे पठान ने हँस कर कहा – ‘ओ जालिम, अमारे हाथ से नई लेता ए तो अपने हाथ से उठा ले. ख़ुदा कसम बकरे का गोश्त ए, और किसी चीज का नईए.’

ऊपर बैठा पठान चहक कर बोला – ‘ओ खंजीर के तुम, इदर तुमें कौन देखता ए? अम तेरी बीवी को नई बोलेगा. ओ तू अमारे साथ बोटी तोड़. अम तेरे साथ दाल पिएगा…’

इस पर कहकहा उठा, पर दुबला-पतला बाबू हँसता, सिर हिलाता रहा और कभी-कभी दो शब्द पश्तो में भी कह देता.

‘ओ कितना बुरा बात ए, अम खाता ए, और तू अमारा मुँ देखता ए…’ सभी पठान मगन थे.

‘यह इसलिए नहीं लेता कि तुमने हाथ नहीं धोए हैं,’ स्थूलकाय सरदार जी बोले और बोलते ही खी-खी करने लगे! अधलेटी मुद्रा में बैठे सरदार जी की आधी तोंद सीट के नीचे लटक रही थी – ‘तुम अभी सो कर उठे हो और उठते ही पोटली खोल कर खाने लग गए हो, इसीलिए बाबू जी तुम्हारे हाथ से नहीं लेते, और कोई बात नहीं.’ और सरदार जी ने मेरी ओर देख कर आँख मारी और फिर खी-खी करने लगे.

‘मांस नई खाता ए, बाबू तो जाओ जनाना डब्बे में बैटो, इदर क्या करता ए?’ फिर कहकहा उठा.

डब्बे में और भी अनेक मुसाफ़िर थे लेकिन पुराने मुसाफ़िर यही थे जो सफ़र शुरू होने में गाड़ी में बैठे थे. बाकी मुसाफ़िर उतरते-चढ़ते रहे थे. पुराने मुसाफ़िर होने के नाते उनमें एक तरह की बे-तकल्लुफ़ी आ गई थी.

‘ओ इदर आ कर बैठो. तुम अमारे साथ बैटो. आओ ज़ालिम, क़िस्सा-खानी की बातें करेंगे.’

तभी किसी स्टेशन पर गाड़ी रुकी थी और नए मुसाफ़िरों का रेला अंदर आ गया था. बहुत-से मुसाफ़िर एक साथ अंदर घुसते चले आए थे.

‘कौन-सा स्टेशन है?’ किसी ने पूछा.

‘वजीराबाद है शायद,’ मैंने बाहर की ओर देख कर कहा.

गाड़ी वहाँ थोड़ी देर के लिए खड़ी रही. पर छूटने से पहले एक छोटी-सी घटना घटी. एक आदमी साथ वाले डिब्बे में से पानी लेने उतरा और नल पर जा कर पानी लोटे में भर रहा था तभी वह भाग कर अपने डिब्बे की ओर लौट आया. छलछलाते लोटे में से पानी गिर रहा था. लेकिन जिस ढंग से वह भागा था, उसी ने बहुत कुछ बता दिया था. नल पर खड़े और लोग भी, तीन-चार आदमी रहे होंगे – इधर-उधर अपने-अपने डिब्बे की ओर भाग गए थे. इस तरह घबरा कर भागते लोगों को मैं देख चुका था. देखते-ही-देखते प्लेटफार्म ख़ाली हो गया. मगर डिब्बे के अंदर अभी भी हँसी-मज़ाक चल रहा था.

‘कहीं कोई गड़बड़ है,’ मेरे पास बैठे दुबले बाबू ने कहा.

कहीं कुछ था, लेकिन क्या था, कोई भी स्पष्ट नहीं जानता था. मैं अनेक दंगे देख चुका था इसलिए वातावरण में होने वाली छोटी-सी तबदील को भी भाँप गया था. भागते व्यक्ति, खटाक से बंद होते दरवाज़े, घरों की छतों पर खड़े लोग, चुप्पी और सन्नाटा, सभी दंगों के चिह्न थे.

तभी पिछले दरवाज़े की ओर से, जो प्लेटफार्म की ओर न खुल कर दूसरी ओर खुलता था, हल्का-सा शोर हुआ. कोई मुसाफ़िर अंदर घुसना चाह रहा था.

‘कहाँ घुसा आ रहा है, नहीं है जगह! बोल दिया जगह नहीं है,’ किसी ने कहा.

‘बंद करो जी दरवाज़ा. यों ही मुँह उठाए घुसे आते हैं.’ आवाज़ें आ रही थीं.

जितनी देर कोई मुसाफ़िर डिब्बे के बाहर खड़ा अंदर आने की चेष्टा करता रहे, अंदर बैठे मुसाफ़िर उसका विरोध करते रहते हैं. पर एक बार जैसे-तैसे वह अंदर जा जाए तो विरोध ख़त्म हो जाता है, और वह मुसाफ़िर जल्दी ही डिब्बे की दुनिया का निवासी बन जाता है, और अगले स्टेशन पर वही सबसे पहले बाहर खड़े मुसाफ़िरों पर चिल्लाने लगता है – नहीं है जगह, अगले डिब्बे में जाओ… घुसे आते हैं…

दरवाज़े पर शोर बढ़ता जा रहा था. तभी मैले-कुचैले कपड़ों और लटकती मूँछों वाला एक आदमी दरवाज़े में से अंदर घुसता दिखाई दिया. चीकट, मैले कपड़े, ज़रूर कहीं हलवाई की दुकान करता होगा. वह लोगों की शिकायतों-आवाज़ों की ओर ध्यान दिए बिना दरवाज़े की ओर घूम कर बड़ा-सा काले रंग का संदूक अंदर की ओर घसीटने लगा.

‘आ जाओ, आ जाओ, तुम भी चढ़ जाओ! वह अपने पीछे किसी से कहे जा रहा था. तभी दरवाज़े में एक पतली सूखी-सी औरत नज़र आई और उससे पीछे सोलह-सतरह बरस की साँवली-सी एक लड़की अंदर आ गई. लोग अभी भी चिल्लाए जा रहे थे. सरदार जी को कूल्हों के बल उठ कर बैठना पड़ा.’

‘बंद करो जी दरवाज़ा, बिना पूछे चढ़े आते हैं, अपने बाप का घर समझ रखा है. मत घुसने दो जी, क्या करते हो, धकेल दो पीछे…’ और लोग भी चिल्ला रहे थे.

वह आदमी अपना सामान अंदर घसीटे जा रहा था और उसकी पत्नी और बेटी संडास के दरवाजे के साथ लग कर खड़े थे.

‘और कोई डिब्बा नहीं मिला? औरत जात को भी यहाँ उठा लाया है?’

वह आदमी पसीने से तर था और हाँफता हुआ सामान अंदर घसीटे जा रहा था. संदूक के बाद रस्सियों से बँधी खाट की पाटियाँ अंदर खींचने लगा.

‘टिकट है जी मेरे पास, मैं बेटिकट नहीं हूँ.’ इस पर डिब्बे में बैठे बहुत-से लोग चुप हो गए, पर बर्थ पर बैठा पठान उचक कर बोला – ‘निकल जाओ इदर से, देखता नई ए, इदर जगा नई ए.’

और पठान ने आव देखा न ताव, आगे बढ़ कर ऊपर से ही उस मुसाफ़िर के लात जमा दी, पर लात उस आदमी को लगने के बजाए उसकी पत्नी के कलेजे में लगी और वहीं ‘हाय-हाय’ करती बैठ गई.

उस आदमी के पास मुसाफ़िरों के साथ उलझने के लिए वक्त नहीं था. वह बराबर अपना सामान अंदर घसीटे जा रहा था. पर डिब्बे में मौन छा गया. खाट की पाटियों के बाद बड़ी-बड़ी गठरियाँ आईं. इस पर ऊपर बैठे पठान की सहन-क्षमता चुक गई. ‘निकालो इसे, कौन ए ये?’ वह चिल्लाया. इस पर दूसरे पठान ने, जो नीचे की सीट पर बैठा था, उस आदमी का संदूक दरवाज़े में से नीचे धकेल दिया, जहाँ लाल वर्दीवाला एक कुली खड़ा सामान अंदर पहुँचा रहा था.

उसकी पत्नी के चोट लगने पर कुछ मुसाफ़िर चुप हो गए थे. केवल कोने में बैठी बुढ़िया करलाए जा रही थी – ‘ए नेकबख़्तों, बैठने दो. आ जा बेटी, तू मेरे पास आ जा. जैसे-तैसे सफ़र काट लेंगे. छोड़ो बे ज़ालिमो, बैठने दो.’

अभी आधा सामान ही अंदर आ पाया होगा जब सहसा गाड़ी सरकने लगी.

‘छूट गया! सामान छूट गया.’ वह आदमी बदहवास-सा हो कर चिल्लाया.

‘पिताजी, सामान छूट गया.’ संडास के दरवाज़े के पास खड़ी लड़की सिर से पाँव तक काँप रही थी और चिल्लाए जा रही थी.

‘उतरो, नीचे उतरो,’ वह आदमी हड़बड़ा कर चिल्लाया और आगे बढ़ कर खाट की पाटियाँ और गठरियाँ बाहर फेंकते हुए दरवाज़े का डंडहरा पकड़ कर नीचे उतर गया. उसके पीछे उसकी व्याकुल बेटी और फिर उसकी पत्नी, कलेजे को दोनों हाथों से दबाए हाय-हाय करती नीचे उतर गई.

‘बहुत बुरा किया है तुम लोगों ने, बहुत बुरा किया है.’ बुढ़िया ऊँचा-ऊँचा बोल रही थी -‘तुम्हारे दिल में दर्द मर गया है. छोटी-सी बच्ची उसके साथ थी. बेरहमो, तुमने बहुत बुरा किया है, धक्के दे कर उतार दिया है.’

गाड़ी सूने प्लेटफार्म को लाँघती आगे बढ़ गई. डिब्बे में व्याकुल-सी चुप्पी छा गई. बुढ़िया ने बोलना बंद कर दिया था. पठानों का विरोध कर पाने की हिम्मत नहीं हुई.

तभी मेरी बगल में बैठे दुबले बाबू ने मेरे बाजू पर हाथ रख कर कहा – ‘आग है, देखो आग लगी है.’

गाड़ी प्लेटफार्म छोड़ कर आगे निकल आई थी और शहर पीछे छूट रहा था. तभी शहर की ओर से उठते धुएँ के बादल और उनमें लपलपाती आग के शोले नज़र आने लगे.

‘दंगा हुआ है. स्टेशन पर भी लोग भाग रहे थे. कहीं दंगा हुआ है.’

शहर में आग लगी थी. बात डिब्बे-भर के मुसाफ़िरों को पता चल गई और वे लपक-लपक कर खिड़कियों में से आग का दृश्य देखने लगे.

जब गाड़ी शहर छोड़ कर आगे बढ़ गई तो डिब्बे में सन्नाटा छा गया. मैंने घूम कर डिब्बे के अंदर देखा, दुबले बाबू का चेहरा पीला पड़ गया था और माथे पर पसीने की परत किसी मुर्दे के माथे की तरह चमक रही थी. मुझे लगा, जैसे अपनी-अपनी जगह बैठे सभी मुसाफ़िरों ने अपने आसपास बैठे लोगों का जायज़ा ले लिया है. सरदार जी उठ कर मेरी सीट पर आ बैठे. नीचे वाली सीट पर बैठा पठान उठा और अपने दो साथी पठानों के साथ ऊपर वाली बर्थ पर चढ़ गया. यही क्रिया शायद रेलगाड़ी के अन्य डिब्बों में भी चल रही थी. डिब्बे में तनाव आ गया. लोगों ने बतियाना बंद कर दिया. तीनों-के-तीनों पठान ऊपरवाली बर्थ पर एक साथ बैठे चुपचाप नीचे की ओर देखे जा रहे थे. सभी मुसाफ़िरों की आँखें पहले से ज़्यादा खुली-खुली, ज़्यादा शंकित-सी लगीं. यही स्थिति संभवत: गाड़ी के सभी डिब्बों में व्याप्त हो रही थी.

‘कौन-सा स्टेशन था यह?’ डिब्बे में किसी ने पूछा.

‘वजीराबाद,’ किसी ने उत्तर दिया.

जवाब मिलने पर डिब्बे में एक और प्रतिक्रिया हुई. पठानों के मन का तनाव फ़ौरन ढीला पड़ गया. जबकि हिंदू-सिक्ख मुसाफ़िरों की चुप्पी और ज़्यादा गहरी हो गई. एक पठान ने अपनी वास्कट की जेब में से नसवार की डिबिया निकाली और नाक में नसवार चढ़ाने लगा. अन्य पठान भी अपनी-अपनी डिबिया निकाल कर नसवार चढ़ाने लगे. बुढ़िया बराबर माला जपे जा रही थी. किसी-किसी वक़्त उसके बुदबुदाते होंठ नजर आते, लगता, उनमें से कोई खोखली-सी आवाज़ निकल रही है.

अगले स्टेशन पर जब गाड़ी रुकी तो वहाँ भी सन्नाटा था. कोई परिंदा तक नहीं फड़क रहा था. हाँ, एक भिश्ती, पीठ पर पानी की मशकल लादे, प्लेटफार्म लाँघ कर आया और मुसाफ़िरों को पानी पिलाने लगा.

‘लो, पियो पानी, पियो पानी.’ औरतों के डिब्बे में से औरतों और बच्चों के अनेक हाथ बाहर निकल आए थे.

‘बहुत मार-काट हुई है, बहुत लोग मरे हैं. लगता था, वह इस मार-काट में अकेला पुण्य कमाने चला आया है.’

गाड़ी सरकी तो सहसा खिड़कियों के पल्ले चढ़ाए जाने लगे. दूर-दूर तक, पहियों की गड़गड़ाहट के साथ, खिड़कियों के पल्ले चढ़ाने की आवाज आने लगी.

किसी अज्ञात आशंकावश दुबला बाबू मेरे पासवाली सीट पर से उठा और दो सीटों के बीच फ़र्श पर लेट गया. उसका चेहरा अभी भी मुर्दे जैसा पीला हो रहा था. इस पर बर्थ पर बैठा पठान उसकी ठिठोली करने लगा – ‘ओ बेग़ैरत, तुम मर्द ए कि औरत ए? सीट पर से उट कर नीचे लेटता ए. तुम मर्द के नाम को बदनाम करता ए.’ वह बोल रहा था और बार-बार हँसे जा रहा था. फिर वह उससे पश्तो में कुछ कहने लगा. बाबू चुप बना लेटा रहा. अन्य सभी मुसाफ़िर चुप थे. डिब्बे का वातावरण बोझिल बना हुआ था.

 

आगे डिब्बे में क्या हुआ यह जानने के लिए कहानी दूसरा भाग ज़रूर पढ़ें!